भारत में सहकारी बैंकिग की क्रियाशीलता
रेनू सरदाना1] मोनिषा चैkधरी2
1असिस्टेन्ट प्रोफेसर अर्थशास्त्र विभाग राजकीय महाविद्यालय तिगांव, फरीदाबाद (हरियाणा)
2असिस्टेन्ट प्रोफेसर अर्थशास्त्र विभाग राजकीय महाविद्यालय तिगांव, फरीदाबाद (हरियाणा)
कृषि वित्त की समस्या वाणिज्य और उद्योग के लिए वित्त की समस्या से भिन्न है। कृषि अपेक्षाकृत असंगठित व्यवसाय हंै। इसकी सफलता या असफलता बहुत कुछ मौसम पर निर्भर करती है। इसके अलावा किसानों द्वारा लिए जाने वाले ऋणों में स्पष्ट रूप से उत्पादक या अनुत्पादक में भेद कर पाना आसान नहीं होता। इसलिए बैंको ने खेती के लिए या उससे संबधित दूसरे कार्यो के लिए ऋण देने में प्रायः दिलचस्पी नहीं दिखाई है। अकालों की पुनरावृति सूखे का प्रकोप प्रायः देश में बना रहता है। जो योजना निर्माताओं के लिए चुनौती है। भारत में कृषिगत अर्थव्यवस्था के पिछड़ेपन का एक कारण साख की सुविधाओं का अभाव माना जाता है। प्रायः किसानों को साख सुविधाओं से पृथक और दूर रखा गया है, पूंजी बाजार तथा अन्य वित्तिय संस्थाओं ने वित्त प्रदान करने में कृषि की उपेक्षा की गई है। यद्यपि कृषक वर्ग अपनी वित्तीय स्थिति तथा ईमानदारी के कारण साख बाजार का सहयोग प्राप्त करने का उपयुक्त अधिकारी है, फिर भी उसे आवश्यक साख उपलब्ध नहीं हो पाती।
कृषकों की वित्तीय आवश्यकताओं की पूर्ति करने के लिए अनेक साधन उपलब्ध है। कृषिगत उत्पादन व उत्पादकता बढ़ाने के लिए साख की उपलब्धि उचित समय पर उचित मात्रा पर उचित ब्याज दरों पर होनी चाहिए। यहाॅं मूल प्रश्न यह है कि क्या कृषकों को ऐसी सुविधांए प्राप्त होती है? उपरोक्त अध्ययन का उद्दे्श्य भारत के संदर्भ में सहकारी बैंको के क्रियाकलापों का आर्थिक विश्लेषण करना तथा सहकारी बैंको की समस्याओं का आकलन करना व बैंको की व्यवहारिक उपादेयता की जाॅंच करना है। अध्ययन पद्धति के अन्तर्गत हमने प्राथमिक समंक व द्वितीयक संमक संकलित किए गए हैं। हमने निर्देशित सहकारी बैंको के आलेख व पांडुलिपियों का प्रयोग बैंको की व्यवहारिक यथार्थ को प्रस्तुत करने के लिए किया है।
भारत में सहकारी बैंकिग:-
भारत में सहकारी साख आंदोलन का प्रारम्भ 1904 में हुआ । सहकारी बैंक वह है जो बैंकिग कार्यों का सम्पादन सहकारिता के आधार पर करे। सहकारिता के अन्तर्गत ’’एक सब के लिए तथा सब एक के लिए’’ के सिद्धान्त का पालन होता है। यह वास्तव में आर्थिक दृष्टि से निर्बल व्यक्तियों का संगठन होता हैं, जिसमे वे उन लाभों को प्राप्त कर सके जो शक्तिशाली एवं धनी लोगों को उपलब्ध हों। इस प्रकार सहकारी बैंक का उद््ेश्य पारस्परिक हित होता है, न कि मुनाफा कमाना।
सहकारी साख संगठन का स्वरूप:-
भारत मे सहकारी साख संगठन का स्वरूप संघीय हैं। इसका ढांचा त्रिस्तुपाकार है जिसमें सबसे नीचे ग्रामीण स्तर पर प्राथमिक कृषि व अकृषि साख समितियां, जिला स्तर पर केन्द्रीय सहकारी बैंक तथा सबसे शीर्ष स्तर पर राज्य सहकारी बैंक होते हैं।
भारत में सहकारिता का प्रारम्भ भी प्राथमिक कृषि साख समितियों द्वारा ही हुआ था। इस प्रकार की समिति की स्थापना के लिए दस अथवा दस से अधिक व्यक्ति मिलकर सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार के पास आवश्यक विवरण भेजकर समिति का रजिस्ट्रेशन करवाते हैं। सहकारी समितियां साधारणतया उत्पादक कार्यो के लिए ऋण देती हैं। समिति द्वारा ऋण उधार लेने वाले की शोधन क्षमता को ध्यान में रखकर ही दिया जाता है जो सामान्यतया उसकी व्यक्तिगत सम्पति के मूल्य के 50 प्रतिशत से अधिक नहीें होता।
स्पष्टीकरण:-
भारत में सहकारी समितियों का विकास तालिका 1.1 में दर्शाया गया है यहाॅं हम दशकीय अवधि 2001-02 से 2010-11 तक की प्रगति को बता रहे हैं। वर्ष 2001-02 में समितियों की संख्या 98247 हजार थी जो वर्ष 2010-11 में समितियों की संख्या घटकर 93413 हजार रह गयी। वर्ष 2002-03 में समितियों की संख्या 1,12,304 लाख थी जो पिछले वर्षों में सर्वाधिक थी । प्राथमिक साख समितियों की जमांए वर्ष 2001-02 में 1,484,570 लाख रुपये थी। जो बढ़कर वर्ष 2010-11 में 37,23,816 लाख रुपये हो गयी। जमाओं में 150.83 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। समितियों द्वारा कुल निर्गमित ऋणों में भी 196.73 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि प्राथमिक सहकारी समितियों का सहकारी संगठन में महत्तवपूर्ण स्थान रहा है। किन्तु कुल बकाया ऋणों में वृद्धि समितियों की ऋण वसूली में अकार्यकुशलता को व्यक्त करती है। वर्ष 2010-11 में कृषि को संस्थागत ऋण में सहकारी समितियों का हिस्सा 15.7 प्रतिशत था।
केन्द्रीय सहकारी बैंक:-
केन्द्रीय सहकारी बैंक का ढाॅंचा त्रिस्तुपाकार होता है। केन्द्रीय सहकारी बैंक द्वितीय स्तर पर होते है । पिछले वर्षों में सहकारी बैंको का नये सिरे से गठन किया गया है और
देश के अधिकांश भागों में प्रत्येक जिले में एक बैंक स्थापित करने की योजना क्रियान्वित की जा रही है। इस पुनर्गठन का प्रमुख उद्देश्य कमजोर बैंको को सबल संस्थाओं के साथ मिलाकर केन्द्रीय साख व्यवस्था को शक्तिशाली बनाना है।
स्पष्टीकरण:-
भारत में केन्द्रीय सहकारी बैंको की प्रगति का विवरण इस प्रकार है। तालिका 1.2 से स्पष्ट है कि केन्द्रीय सहकारी बैंको की संख्या वर्ष 2010-11 में 371 है। बैंको की कुल जमाओं में पिछले 10 वर्षो में दो गुनी से भी अधिक वृद्धि हुई है। वर्ष 2001-02 में बैंको की कुल जमांए 66,79,721 लाख रुपये थी। जो बढ़कर वर्ष 2010-11 में 1,61,30,882 करोड़ हो गई है। बैकों की कार्यशील पूंजी में भी 130.77 प्रतिशत की व्द्धि हुई है। ऋण वितरण में इन बंैको की वर्ष 2001-02 में 5173304 लाख व वर्ष 2010-11 में 13775717 करोड़ रु की स्थिति रही है।
इस प्रकार इन बैंको ने निरन्तर प्रभावी प्रगति की है और आज भी निरन्तर प्रगति कर रहें हैं।
राज्य सहकारी बैंक:-
भारत में प्रत्येक राज्य में एक राज्य सहकारी बैंक की स्थापना की गई है। राज्य सहकारी बैंको का सबसे प्रमुख कार्य केन्द्रीय सहकारी बैंको के माध्यम से प्राथमिक सहकारी समितियों को अधिकाधिक सहायता पहुॅंचाना है। जिससे वे सदस्यों की ऋण सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा कर सके।
स्पष्टीकरण:-
तालिका 1.3 से स्पष्ट होता है कि भरत में राज्य सहकारी बैंको की संख्या वर्ष 2001-02 में 30 थी जो वर्ष 2010-11 में 31 हो गई । राज्य सहकारी बैंको की शांखाएॅ जिसमें मुख्य शाखा भी सम्मिलत है वर्ष 2001-02 में 899 थी जो बढ़कर 2010-11 में 1028 हो गई। सहकारी बैंको की शाखाओं के विस्तार से हाल के वर्षों में भारत के कृषि विकास व आधुनिकीकरण में दुगने सेे अधिक वृद्धि हुई है और निर्गमित ऋण वर्ष 2001-02 में 3405066 लाख रु थे जो बढ़कर 2010-11 में 6848063 लाख रु थे। इस विवेचन से यह बात स्पष्ट होती है कि ग्रामीण क्षेत्र में सहकारी बैंको ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सहकारी साख: समस्यांए एंव मूल्यांकन -
जैसा कि उपर दिये गये आंकड़ों से स्पष्ट है, स्वतन्त्रता के बाद सहकारी समितियों द्वारा दिये जाने वाले ऋणों की मात्रा मे तेज वृद्धि हुई है। परन्तु सहकारी समितियाॅं बैंकिग व्यवस्था को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा है।
ऽ प्राथमिक सहकारी समितियंा अभी भी केन्द्रीय सहकारी बैंको व बाहरी साधनों पर निर्भर बनी हुई है इस निर्भरता के कारण प्राथमिक सहकारी समितियों के कामकाज में बाहरी संस्थाओं का हस्तक्षेप बना हुआ है।
ऽ सहकारी समितियों की ऋण वसूली की स्थिति अच्छी नहीं है। अनुमान लगाया गया है कि समितियों द्वारा दिये गये ऋणों मे से लगभग 40 प्रतिशत ऋण वसूली के बाद भी लौटाए नहीं गए।
ऽ विगत वर्षों पर दृष्टिपात किया जाए तो यह तथ्य सामने आते हैं कि सहकारी बैंको द्वारा केवल कृषि क्षेत्र में ही कार्य किया जाता है, किन्तु वर्तमान में आर्थिक उदारीकरण के कारण सहकारी बैंकों द्वारा अन्य क्षेत्रों में भी कार्य किया जा रहा है, किन्तु नई योजनाओं को लागू करने में कठिनाई महसूस की जाती है।
ऽ केन्द्रीय सहकारी बैंक की प्रबन्धकीय व्यवस्था हेतु निर्वाचित संचालक मण्डल उत्तरदायी होता है संचालक मंडल जनहित एंव संस्थाहित में निर्णय लेकर नीति निर्धारित करता है लेकिन सरकारी हस्तक्षेप के कारण इनके द्वारा बनाई गई नीतियां क्रियान्वित नहीं हो पाती।
ऽ राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण भी बैंक अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह निष्पक्षता से नहीं कर पाते।
ऽ ग्राम सेवा सहकारी समिति में शिक्षित एंव प्रशिक्षित कर्मचारियों का अभाव पाया जाता है।
ऽ यह तथ्य भी अत्यन्त चिन्ता का विषय है कि बहुत सी सहकारी संस्थाओं को काफी घाटा उठाना पड़ा है। 31 मार्च 2010 के दिन 31 राज्य सहकारी बैको में से 2 राज्य सहकारी बैंको, 370 केन्द्रीय सहकारी बैकों में से 47 केन्द्रीय सहकारी बैंको 94647 प्राथमिक सहकारी समितियों को हानि उठानी पड़ी। ग्रामीण सहकारी संस्थाओं की (अप्रयोज्य अस्तियां) अत्यधिक है अनुप्रयोज्य अस्तियों के इस उच्च स्तर पर होने से सरकारी संस्थाओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और उनकी प्रचलन क्षमता कम हुई है।
भारत में प्राथमिक साख समितियों की प्रगति (2001-02, 2010-11)
स्पष्टीकरण:- भारत में सहकारी समितियों का विकास तालिका 1.1 में दर्शाया गया है यहाॅं हम दशकीय अवधि 2001-02 से 2010-11 तक की प्रगति को बता रहे हैं। वर्ष 2001-02 में समितियों की संख्या 98247 हजार थी जो वर्ष 2010-11 में समितियों की संख्या घटकर 93413 हजार रह गयी। वर्ष 2002-03 में समितियों की संख्या 1,12,304 लाख थी जो पिछले वर्षों में सर्वाधिक थी । प्राथमिक साख समितियों की जमांए वर्ष 2001-02 में 1,484,570 लाख रुपये थी। जो बढ़कर वर्ष 2010-11 में 37,23,816 लाख रुपये हो गयी। जमाओं में 150.83 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। समितियों द्वारा कुल निर्गमित ऋणों में भी 196.73 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। उपरोक्त तालिका से स्पष्ट है कि प्राथमिक सहकारी समितियों का सहकारी संगठन में महत्तवपूर्ण स्थान रहा है। किन्तु कुल बकाया ऋणों में वृद्धि समितियों की ऋण वसूली में अकार्यकुशलता को व्यक्त करती है। वर्ष 2010-11 में कृषि को संस्थागत ऋण में सहकारी समितियों का हिस्सा 15.7 प्रतिशत था।
केन्द्रीय सहकारी बैंक:- केन्द्रीय सहकारी बैंक का ढाॅंचा त्रिस्तुपाकार होता है। केन्द्रीय सहकारी बैंक द्वितीय स्तर पर होते है । पिछले वर्षों में सहकारी बैंको का नये सिरे से गठन किया गया है और देश के अधिकांश भागों में प्रत्येक जिले में एक बैंक स्थापित करने की योजना क्रियान्वित की जा रही है। इस पुनर्गठन का प्रमुख उद्देश्य कमजोर बैंको को सबल संस्थाओं के साथ मिलाकर केन्द्रीय साख व्यवस्था को शक्तिशाली बनाना है।
स्पष्टीकरण:- भारत में केन्द्रीय सहकारी बैंको की प्रगति का विवरण इस प्रकार है। तालिका 1.2 से स्पष्ट है कि केन्द्रीय सहकारी बैंको की संख्या वर्ष 2010-11 में 371 है। बैंको की कुल जमाओं में पिछले 10 वर्षो में दो गुनी से भी अधिक वृद्धि हुई है। वर्ष 2001-02 में बैंको की कुल जमांए 66,79,721 लाख रुपये थी। जो बढ़कर वर्ष 2010-11 में 1,61,30,882 करोड़ हो गई है। बैकों की कार्यशील पूंजी में भी 130.77 प्रतिशत की व्द्धि हुई है। ऋण वितरण में इन बंैको की वर्ष 2001-02 में 5173304 लाख व वर्ष 2010-11 में 13775717 करोड़ रु की स्थिति रही है।
इस प्रकार इन बैंको ने निरन्तर प्रभावी प्रगति की है और आज भी निरन्तर प्रगति कर रहें हैं।
राज्य सहकारी बैंक:-भारत में प्रत्येक राज्य में एक राज्य सहकारी बैंक की स्थापना की गई है। राज्य सहकारी बैंको का सबसे प्रमुख कार्य केन्द्रीय सहकारी बैंको के माध्यम से प्राथमिक सहकारी समितियों को अधिकाधिक सहायता पहुॅंचाना है। जिससे वे सदस्यों की ऋण सम्बन्धी आवश्यकताओं को पूरा कर सके।
स्पष्टीकरण:- तालिका 1.3 से स्पष्ट होता है कि भरत में राज्य सहकारी बैंको की संख्या वर्ष 2001-02 में 30 थी जो वर्ष 2010-11 में 31 हो गई । राज्य सहकारी बैंको की शांखाएॅ जिसमें मुख्य शाखा भी सम्मिलत है वर्ष 2001-02 में 899 थी जो बढ़कर 2010-11 में 1028 हो गई। सहकारी बैंको की शाखाओं के विस्तार से हाल के वर्षों में भारत के कृषि विकास व आधुनिकीकरण में दुगने सेे अधिक वृद्धि हुई है और निर्गमित ऋण वर्ष 2001-02 में 3405066 लाख रु थे जो बढ़कर 2010-11 में 6848063 लाख रु थे। इस विवेचन से यह बात स्पष्ट होती है कि ग्रामीण क्षेत्र में सहकारी बैंको ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
सहकारी साख: समस्यांए एंव मूल्यांकन -
जैसा कि उपर दिये गये आंकड़ों से स्पष्ट है, स्वतन्त्रता के बाद सहकारी समितियों द्वारा दिये जाने वाले ऋणों की मात्रा मे तेज वृद्धि हुई है। परन्तु सहकारी समितियाॅं बैंकिग व्यवस्था को कई प्रकार की समस्याओं का सामना करना पड़ा है।
ऽ प्राथमिक सहकारी समितियंा अभी भी केन्द्रीय सहकारी बैंको व बाहरी साधनों पर निर्भर बनी हुई है इस निर्भरता के कारण प्राथमिक सहकारी समितियों के कामकाज में बाहरी संस्थाओं का हस्तक्षेप बना हुआ है।
ऽ सहकारी समितियों की ऋण वसूली की स्थिति अच्छी नहीं है। अनुमान लगाया गया है कि समितियों द्वारा दिये गये ऋणों मे से लगभग 40 प्रतिशत ऋण वसूली के बाद भी लौटाए नहीं गए।
ऽ विगत वर्षों पर दृष्टिपात किया जाए तो यह तथ्य सामने आते हैं कि सहकारी बैंको द्वारा केवल कृषि क्षेत्र में ही कार्य किया जाता है, किन्तु वर्तमान में आर्थिक उदारीकरण के कारण सहकारी बैंकों द्वारा अन्य क्षेत्रों में भी कार्य किया जा रहा है, किन्तु नई योजनाओं को लागू करने में कठिनाई महसूस की जाती है।
ऽ केन्द्रीय सहकारी बैंक की प्रबन्धकीय व्यवस्था हेतु निर्वाचित संचालक मण्डल उत्तरदायी होता है संचालक मंडल जनहित एंव संस्थाहित में निर्णय लेकर नीति निर्धारित करता है लेकिन सरकारी हस्तक्षेप के कारण इनके द्वारा बनाई गई नीतियां क्रियान्वित नहीं हो पाती।
ऽ राजनैतिक हस्तक्षेप के कारण भी बैंक अपने उत्तरदायित्वों का निर्वाह निष्पक्षता से नहीं कर पाते।
ऽ ग्राम सेवा सहकारी समिति में शिक्षित एंव प्रशिक्षित कर्मचारियों का अभाव पाया जाता है।
ऽ यह तथ्य भी अत्यन्त चिन्ता का विषय है कि बहुत सी सहकारी संस्थाओं को काफी घाटा उठाना पड़ा है। 31 मार्च 2010 के दिन 31 राज्य सहकारी बैको में से 2 राज्य सहकारी बैंको, 370 केन्द्रीय सहकारी बैकों में से 47 केन्द्रीय सहकारी बैंको 94647 प्राथमिक सहकारी समितियों को हानि उठानी पड़ी।
ऽ ग्रामीण सहकारी संस्थाओं की (अप्रयोज्य अस्तियां) अत्यधिक है अनुप्रयोज्य अस्तियों के इस उच्च स्तर पर होने से सरकारी संस्थाओं के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है और उनकी प्रचलन क्षमता कम हुई है।
Received on 20.04.2013
Revised on 15.05.2013
Accepted on 21.05.2013
© A&V Publication all right reserved
Research J. Humanities and Social Sciences. 4(2): January-March, 2013, 250-253